अपन मिथिला
Thursday, 7 February 2013
गज़ल - अजय ठाकुर (मोहन जी)
खसैत अछि जखन नोर आँखिसँ
झहरए लागैए दरद आँखिसँ
हेबे करता ओ चान-सुरूज-तारा
देखबामे तँ अछि फकीर आँखिसँ
जँ सटा लेताह ओ अपन छातीसँ
भगबे टा करत इ दर्द आँखिसँ
पता नै जेतै कते जान दुनियाँमे
"मोहन" जँ छोड़ि देता तीर आँखिसँ.
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