Saturday, 14 April 2012

प्रभाकर बाबा और सुंदर कनियाँ – अजय ठाकुर (मोहन जी)


मिथलांचल में ओना तऽ बाबा सब के बहुत आदर- सत्कार कैल जायत अछि, हम एहने एक प्रभाकर बाबा के हंसी भरल घटना सुना रहल छी,


प्रभाकर बाबा भाल्पट्टी गाम के रहनिहार छिया, इ झार-फुक सेहो करेत छथि ताहि लक् ई बहुत बिख्यात भऽ गेला, 


प्रभाकर बाबा एक दिन कोनो कारन बस बम्बई सऽ हवाई जहाज में आबि रहल छला, हुनका बगल में एक सुंदर कनियाँ के शीट छल कनियाँ सेहो आबि क हुनका बगल में बैसी गेलैन,


सुंदर कनियाँ जहाज में सफर करैत काल प्रभाकर बाबा सऽ कहलखिन बाबा आहा हमरा पर एक कृपा कऽ सकेत छी ?


प्रभाकर बाबा सुंदर कनियाँ कहलखिन आहा कहू तऽ सही हम आहा के कि मदद करू ?
कनियाँ बजली बाबा हम नै एक बहुमूल्य चीज़ “लिपिस्टिक” खरिद्लो हन् लेकिन ओ कस्टम के लिमिट के ऊपर भ गेल हन्, 


हमरा डर या जे कस्टम वला ओकरा जब्त नै कऽ लिये, आहा जे “लिपिस्टिक” के अपना चोंगा के अंदर नुका कऽ ल चलितो !


प्रभाकर बाबा बजला ओना तऽ आहाक मदद करे में हमरा खुशी मिलतै, मगर आहाके कही दी जे हम झूठ नहीं बाजे छी !


बाबा जी आहॅक मासूम मुह के वजह स आहाके कियो पकरत नहीं, त झूठ बाजे के सवाले नहीं उठत !
प्रभाकर बाबा कहलैथ ठीक या आहाक जे विचार .


हवाई जहाज जखन  आकाश स धरती उतरल त सब कस्टम स जय लागल, कनियाँ बाबा के आगा जय देलखिन और अपने पीछा-पीछा बीड़ा भ गेली .


कस्टम के ऑफीसर सब सवारी के जेना पुछलक ओनाही प्रभाकर बाबा स सेहो पुछलक, बाबा जी आहा गैरकानुनी तरीका स किछु छुपेलो हन् त नहीं ?


प्रभाकर बाबा बजला हमरा कापर सऽ निचा ड़ाऽर (कमर) तक किछु गैरकानुनी तौर किछु  नहीं छुपेलो हन् .
ऑफीसर के इ प्रभाकर बाबा जबाब किछु अजीब सन् लगले, ताहि दुआरे फेर स पुछलक, और  ड़ाऽर सऽ निचा जमीन तक आहा गैरकानुनी तौर पर किछु नुकेलो हाँ कि ?


प्रभाकर बाबा बजला हां एक छोट सुंदर चीज छुपेलो हन्.... जेकर इस्तेमाल औरते टाऽ करैत अछि...लेकिन हमरा 
पास जे या ओकर इस्तेमाल अखन तक नहीं भेल हन् बुझलो कस्टम बाबु !


जोर सऽ ठहाका लगाबैत ऑफीसर कहलक, ठीक या बाबा जी आहा जा सकेऽ छी, ....नेक्स्ट !

रचनाकार :- अजय ठाकुर (मोहन जी)

गज़ल - अजय ठाकुर (मोहन जी)


हम त बैन बैशलो शराबी की करू /
और कनियाँ स जुदा हम कि रहु //
जिन्दगी बाकी या आब त थोरे दिन /
दुनू तरप जरैत देह अछी की करू //
कनियाँ ल क आबी गेलैथ हन शीशा /
लेकिन हम खुदस हारल छी की करू //
छल कहाँ नाव दुबाबे के गप्प  /
हम त अंधी के हवा छी की करू //
टुकरा में बैट गेल हमर के पहचान /
हम त टुटल शीशा छी की करू //


गज़ल - अजय ठाकुर (मोहन जी)


आहा कने पिबऽ दिय एक पैग के त बात या
कैह त पायब हुनका ओ राज के त बात या
 
नै कोनो सिकवा गीला नै कोनो फरियाद या
हम समझे छी आहाक हालात के त बात या
 
हम आहाक सामने जाहिर कऽरी या नै कऽरी
जान लेब हमर की इ जजबात के त बात या
 
तपलीफ में छी हम जख्म अहिक नाम स
मैन लेलो हम एकरा सौगात के त बात या
 
आई तक "मोहन जी"  हारलथि कोनो खेल स
जे मिलल तकदीर स ओ म्हात के त बात या

Thursday, 29 March 2012

चाय के चुस्की मुस्की के संग – अजय ठाकुर (मोहन जी)


विजय जी और रंजना के प्रेम बिवाह किछु माह पहीले भेल अछि ! दुरागमन सेहो संगे भऽ गेल किछु दिन के बाद विजय जिक कनियाँ रंजना कहलखिन, हमरा बिवाह के दु माश भ गेल और अखन तक आहा हमरा कतो घुमाव नहीं ल गेलो हन्!  
विजय जी किछु देर चुप रहला और फेर बजला हे हमरा जावेत धरी माँ और बाबुजी नहीं कहता तावेत तक हम आहा के कतो घुमाव नहीं ल जायब बुझलो ! रंजना के मोन कने उदाश भ गेल फेर दुनो गोटे अपन अपन कॉज में लागी गेला ! विजय जी फेर रंजना के समझा क ओ अपन बाबु जिक पास गेला और कहलखिन जे रंजना के इच्छा भ रहल छै जे कतो घुमे लेल जय के से जओ आहा के आज्ञा होय त हम दुनो गोटे घुमी आबि ! बाबु जी हाँ कही देलखिन !

विजय जी और रंजना यात्रा केरी तयारी शुरू क देला ! दुनो प्राणी माँ बाबुजी के आशीर्वाद लेलाह और घर सऽ निकैल गेला ! सकरी टीसन पर जा क टिकट कटेला ताबैत धरी शहीद एक्सप्रेस सेहो टीसन पर आबि गेल दुनो गोटे गाड़ी पर जाकऽ बैसी गेला ! आब गाड़ी के ड्राईवर बाबु सेहो पुक्की मारला पु....पु..पुपुपुपुपुपू....छु..क.. छुक..छुकछुक  छुक..., गाड़ी आगू बढ़ऽ लागल !

गाड़ी जहान पांच-छः टीसन आगा बरहल ताहि के बाद एकर लेन किलयर नहीं छल ताहि लक् गाड़ी के २-३ घंटा रोकी देलक ! ताबैत में ओमहर सऽ चाय वला गर्म चाय-गर्म चाय कहैत आयल रंजना अपन स्वामी के कहैत छथि एक कॉप चाह पीबी लिय आहा भोर में सेहो नहीं पिलो आब विजय जी दु कॉप चाह के पाई देलखिन और दुनो गोटे पिबऽ लगला ! रंजना दु घुट पीब क खिड़की स बाहर फेक देलक, विजय जी पुछलखिन कि भेल ? रंजना कहलखिन चाह में स्वाद नहीं लगाल !
विजय जी कहलखिन ठीक छै गाड़ी लेट या चलू उतरी क कोनो दोकान पर चाह पीबी लई छी, दरभँगा में ओनाहू जान-पहचान के बहुत दोकानदार अछि !

विजय जी और रंजना दोनों गोटे गाड़ी स उतरी क दोकान दिश बढला ! एक दोकान पर जा क दु टा चाह और दु टा सिंघारा के आर्डर देलखिन ! थोरबे देर में चाह और सिंघारा लक् आबि ग्लेन दुनो गोटे सिंघारा पावऽ लगला और चाह सऽ ठोड़ पकावऽ लगला ! रंजना चाह पीबी कने मुस्किया देलखिन आब दुनो गोटे अपना आप में टकटकी लगा क देखऽ लगला और बिशैर गेलखिन कि हमरा गाड़ी पकरबाक अछि!

लगभग आधा घंटा के बाद दोकानदार अपन कप लै आयल त देख क कह: लागल अऊ जी महराज लिय चाय के चुस्की मुस्की के संग, मगर हमर कप त छोरी दिय औरो ग्राहक चाय के लेल ठाढ या ! ई बात सुनी क रंजना और विजय के मोन लज्जा गेलैन और ओत् स परेलो बाट नहीं सुझलैन ! और ओ जे टीसन पर अयला त देखैत छथि जे ओ गाड़ी फुजी गेल छल आब दुनो गोटे अपना घर आबि गेला ! माँ और बाबुजी पुछलखिन कि आहा दुनो गेलिये नहीं,
विजय जी बजला बाबुजी गाड़ी हमर छुइट गेल त हम दुनो गोटे सोचलो कि बाद में कहियो चली जायब ! बाबुजी बजला अत्ति उत्तम जे विचार हुये से करू !

रचनाकार - अजय ठाकुर (मोहन जी)