Saturday, 14 April 2012

गज़ल - अजय ठाकुर (मोहन जी)


हम त बैन बैशलो शराबी की करू /
और कनियाँ स जुदा हम कि रहु //
जिन्दगी बाकी या आब त थोरे दिन /
दुनू तरप जरैत देह अछी की करू //
कनियाँ ल क आबी गेलैथ हन शीशा /
लेकिन हम खुदस हारल छी की करू //
छल कहाँ नाव दुबाबे के गप्प  /
हम त अंधी के हवा छी की करू //
टुकरा में बैट गेल हमर के पहचान /
हम त टुटल शीशा छी की करू //


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